एक बार नाराज जी धरती पर भ्रमण करने आये थे ।  उन्होंने देखा कि इमली के पेड़ के नीचे दो ब्राह्मण तपस्या कर रहे थे। उन्होंने नारद जी को देख कर खड़े होकर प्रणाम किया और उन्होंने कहा,नारद जी जी आप हमें बताएंगे श्री हरि नारायण हमें कब दर्शन देंगे?इन दोनों ब्राह्मणों ने कहा, हम 10 साल से यही बैठकर तपस्या कर रहे हैं।  आप हमें बताएंगे श्री नारायण हमें कब दर्शन देंगे।  फिर नारद मुनि ने कहा, नारायण नारायण में अभी  जाकर श्रीहरि से पूछ कर आता हूं।ऐसा कहकर नारद मुनि अंतर्धान हो गए।



उसके बाद  नारद जी   मुनिवर भगवान श्री हरी नारायण  के बैकुण्ड लोक  पहुंचे।  वहां जाकर उन्होने  उनके भक्तों की सारी कहानी बताई।  फिर उन्होंने कहा श्रीहरि  आप दोनों भक्तो को कब दर्शन दोगे?कुछ देर सोचकर श्री हरिनारायण ने कहा, हे नारद मुनि मे उन दोनों भक्तों की तपस्या और पूजा  से प्रसन्न नहीं हूं। वह जिस पेड़ के नीचे बैठकर तपस्या कर रहे हैं जितने उस पेड़ में पत्ते हैं, उतने ही वर्षों बाद में उन्हें दर्शन  दूंगा    ।श्री हरी नारायण की बातों को सुनकर नारद मुनि हैरान रह गए।श्री हरी नारायण की बातें सुनकर नारदजी वहाँ से नारायण नारायण बोल के निकले और उन दोनों ब्राह्मणों के पास पहुंचे हैं और उन ब्राह्मण ने उन्हें प्रणाम किया और ब्राह्मणों ने कहा, नारद जी आपने श्री हरिनारायण से पूछा, वह हमें कब दर्शन देंगे?



नारद जी  ने कहा भक्तों ने आपके प्रश्न का उत्तर श्री हरिनारायण से पूछा और उन्होंने बताया कि मैं आपके भक्ति से पसंद नहीं हूं और उन्होंने कहा, जिस इमली के पेड़ के नीचे आप बैठकर तपस्या कर रहे हैं। जितने इस पेड़ के पत्ते है उतने ही साल बाद वह तुम्हे दर्शन  देंग। 

नारद जी बातें सुनकर पहले ब्राह्मण को गुस्सा आ गया।  उन्होंने कहा कि 10 साल से हम तपस्या कर रहे हैं।  हमारी भक्ति में क्या कमी आ गई और हमें और इंतजार करना होगा और वहाँ से चला गया।नारद जी बोले, दूसरे ब्राह्मण से आप क्यों मुस्कुरा रहे हैं?फिर वह ब्राह्मण बोला, श्री नारद जी कम से कम मेरेश्री हरी नारायण  मुझे तो देख रहे हैं।  वह आज नहीं तो कल मुझे दर्शन देने के लिए सोच तो रहे हैं।ब्राह्मण की बातें सुनकर श्री हरिनारायण वहाँ प्रकट हो गए और उन्हें देखकर नारदजी अचंभित हो गए और फिर वह बोले प्रभु आप तो इन दोनों भक्तों की तपस्या से प्रसन्न नहीं थे।  आप उन्हें दर्शन देने क्यों आए हो?

 श्री हरी नारायण  बोले नारद जी में दर्शन देने नहीं आए।  मैं अपने भक्तों के दर्शन करने आया हूं जो भक्त मेरे  सच्ची भाव से पूजा और मेरे पर विश्वास रकते है  मे उनका दास बन जाता हु और उन्हें मे दर्शन  अवश्य देता हूँ।